बड़ा सवालः-मुख्यमंत्री द्वारा बनाई गई एसआईटी की जांच रिपोर्ट को ही झूठला दिया राजपुर पुलिस ने
-भू-माफिया के लोग मुकदमों में फाईनल रिपोर्ट लगाने का कर रहे काम
-भू-माफिया द्वारा अपना नाम संजय कुमार करने के भी मुकदमे है दर्ज
मयूर गुप्ता
देहरादून। प्रदेश के मुखिया के निर्देश पर भू-माफियाओं के खिलाफ जांच किए जाने और उनके
खिलाफ मुकदमे दर्ज करने के लिए गठित की गई एसआईटी टीम द्वारा अपनी जांच में सरकारी जमीनों को खुर्दबुर्द किए जाने और भाले-भाले लोगों को अपनी बातों के जाल में फंसाकर फर्जी रजिस्ट्रीया करने वालों के खिलाफ पुख्ता सुबूत एकत्र हो जाने के बाद देहरादून के विभिन्न कोतवाली और थाने पर संगीन धाराओं में दर्ज करवाए गए मुकदमों की विवेचना करने वाले विवेचकों ने तो मुख्यमंत्री के निर्देश पर बनाई गई एसआईटी को ही झूठलाने का काम किया और सभी मुकदमों में फाईनल रिपोर्ट लगाने का काम कर रहे है।
मुख्यमं़त्री पुष्कर सिंह धामी को जब इस बात की लिखित में शिकायते प्राप्त होने लगी थी कि देहरादून के कुछ भू-माफियाओं जिसमे कुख्यात भू-माफिया संजय घई और उसके साथ काम करने वाले लोगों ने खली पड़ी करोड़ों रुपयों की जमीनों को बेचने का काम किया और उन लोगों से संपर्क तक नहीं किया जिनकी जमीने थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने रिटायर्ड एक पुलिस अधिकारी डीआईजी स्तर के नेतृत्व में एसआईटी का गठन कर दिया था। इस बात का पता जब उक्त भू-माफिया और उसके गुर्गां को चला तो उनमे हड़कप मच गया था।
अपने आकों के खिलाफ एसआईटी में चल रही जांचों को प्रभावित करने के लिए उसके गुर्गां ने एसआईटी आधिकारियों से संपर्क साधने का प्रयास किया था लेकिन वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके थे। सूत्र बताते है कि एक व्यक्ति ने तो एसआईटी के अधिकारियों से जांच को समाप्त करने के नाम पर लाखों रुपये भी ले लिए थे और संजय घई की कार के चालक सुरेश चन्द यादव उर्फ शिब्बू को एसआईटी कार्यालय के बाहर तक अपनी कार में ले जाकर उसे जांच अधिकारियों के समक्ष बयान अंकित करवाने के लिए भेज दिया था।
एसआईटी के नामित अधिकारी अरूण कुमार श्रीवास्तव स्टाम्प एवं निबंधक विभाग उत्तराखंड देहरादून/सहायक महानिरीक्षक निबंध हरिद्वार द्वारा भू-माफिया संजय घई और उसके साथियों के
खिलाफ देहरादून के रायपुर, राजपुर और सेलाकुई थाने पर जमीनों की फर्जी रजिस्ट्रीया करने तथा जमीनों को खुर्द-बुर्द किए जाने के संगीन धाराओं में नामजद अभियोग पंजीकृत करवाए। उक्त अधिकारी ने संजय घई द्वारा अपना नाम बदलकर संजय कुमार कर लिए जाने का भी नामजद मुकदमों में उसका उल्लेख किया।
बस यही से खेल शुरू हुआ। संजय घई और उसके गुर्गां ने विवेचक को उक्त मुकदमे से संबंधित गलत दस्तावजों को सौंपा और अपनी मिठी-चुपड़ी बातों में लेकर मात्र पांच माह में भी मुकदमे में 11 जुलाई 2025 को फाईनल रिपोर्ट लगवाने में कामयाबी हासिल कर ली। सवाल यह खड़ा होता है कि क्या संजय घई के साथ साए की तरह रहने वाले उसके गुर्गां और नामजद आरोपी संजय घई द्वारा विवेचक को सौंपे गए जमीन से संबंधित दस्तावेज सही थे, क्या विवेचक ने एसआईटी द्वारा विवेचना के लिए सौंपे गए दस्तावेज गलत थे या फिर एसआईटी की टीम में शामिल सहायक उपनिबंधक अरूण कुमार श्रीवास्तव गलत थे और उन्होंने खुरावा की जमीन से संबंधित जांच सही ढंग से नहीं की।
संजय घई और उसके साथियों पर देहरादून के रायपुर और सेलाकुई थाने पर भी जमीनों की फर्जी रस्ट्रिया करने से संबंधित संगीन धाराओ में नामजद अभियोग पंजीकृत है और संजय घई के गुर्गे मुकदमों की विवेचना कर रहे विवेचकों के संपर्क में रहकर उनमे भी फाईनल रिपोर्ट लगवाने की जुगत में है। जल्द ही शाह टाइम्स के पाठकों के सामने खुरावा की जमीन के असली दस्तावेजों के साथ खबर को प्रकाशित किया जाएगा।
एसआईटी के नामित अधिकारी अरूण कुमार श्रीवास्तव स्टाम्प एवं निबंधक विभाग उत्तराखंड देहरादून/सहायक महानिरीक्षक निबंध हरिद्वार द्वारा सेलाकुई थाने पर मुकदमा दर्ज करवाते हुए बताया कि संजय घई द्वारा इंडियन ओवरसीज पीस फाउण्डेशन ट्रस्ट की भूमि को खुर्द-बुर्द कर दिया गया। उक्त मुकदमे की विवेचना कर रहे विवेचक से फोन द्वारा संजय घई के गुर्गे संपर्क में रहे। अब सवाल यह उठता है कि लोगों की जमीनों और प्रदेश सरकार द्वारा निहित की गई गोल्डन फोरेस्ट की जमीनों को दस्तावेजों में छेड़छाड़ कर बेचने का काम करने वालों के खिलाफ गठित की गई एसआईटी मुकदमे दर्ज करवाए जाने से पूर्व की गई जांच में पूरा मामला साफ हो जाने के बाद दून के एसएसपी को मुकदमे दर्ज करने के लिए भेजी गई रिपोर्ट के बाद दर्ज किए गए मुकदमों को ही खाकी वर्दीधारी दरोगाओं ने ही झूठलाने का काम किया।
सवाल यह है कि अगर एसआईटी में नियुक्त अधिकारियां द्वारा जांच गलत की गई थी और उसे तरोड़-मरोड़कर पुलिस को मुकदमा दर्ज करने के लिए भेजा गया था तो फिर उक्त एसआईटी को भंग क्यों नहीं किया गया और ेगलत जांच करने वाले अधिकारियों के खिलाफ मुख्यमंत्री द्वारा कार्यवाही क्यों नहीं की गई। एसआईटी में अपनी दा नहीं गलते देख भू-माफिया के गुर्गां ने एक ही रास्ता चुना और वह था पुलिस का। मुकदमों की विवेचना कर रहे विवेचकों के संपर्क में आकर उनसे मन-माफिक रिपोर्ट लिखवाकर मुकदमों को बंद करवाए जाने का काम किया जा रहा है।