भालुओं का बदलता व्यवहार: पहाड़ों में बढ़ रहा मानव-वन्यजीव संघर्ष

मयूर गुप्ता –

देहरादून: उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में भालुओं का व्यवहार अप्रत्याशित रूप से आक्रामक हो गया है। आंकड़ों और विशेषज्ञों की राय यह संकेत दे रही है कि जलवायु परिवर्तन का सीधा असर इन वन्यजीवों के जीवनचक्र पर पड़ा है, जिसके कारण वे अब सामान्य समय से पहले और अधिक सक्रिय होकर इंसानी बस्तियों का रुख कर रहे हैं।

सामान्यतः नवंबर तक गहरी नींद (हाइबरनेशन) में चले जाने वाले भालू इस साल पहाड़ों में सक्रिय देखे जा रहे हैं। इसका सीधा कारण है: कम बर्फबारी और ठंड में देरी।

वन विभाग के पीसीसीएफ (वन्यजीव) रंजन मिश्रा ने इस बदलते व्यवहार पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “इस बार पर्वतीय इलाकों में बर्फबारी बेहद कम हुई है और ठंड भी देर से पड़ी है। सामान्य तौर पर नवंबर के आरंभ तक ऊंचे इलाकों में बर्फ की मोटी परत जम जाती थी, जिससे भालू अपनी गुफा में चले जाते थे। लेकिन इस बार बर्फ की कमी और जंगलों में भोजन की उपलब्धता घटने से भालू असामान्य रूप से सक्रिय बने हुए हैं।”

इस असामान्य सक्रियता के कारण चमोली जिले के जोशीमठ और घाट क्षेत्रों में मवेशियों पर हमलों की कई घटनाएं सामने आई हैं, जिससे स्थानीय किसानों में दहशत फैल गई है।

वन्यजीवों के व्यवहार पर गहन अध्ययन कर चुके विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ तात्कालिक समस्या नहीं है, बल्कि यह बड़े पर्यावरणीय बदलावों की ओर इशारा करता है।

वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के रिटायर्ड प्रोफेसर कमर कुरैशी ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए कहा कि यह समस्या अब केवल सुरक्षा का नहीं बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन का संकेत भी है।

वहीं, वन्यजीव विशेषज्ञ एवं विभाग के पूर्व उपनिदेशक रंगनाथ पांडे ने इस समाचार पत्र को बताया, “भालू भोजन की तलाश में अब ऊंचाई वाले इलाकों से नीचे की ओर आ रहे हैं। यह उनके प्राकृतिक व्यवहार में बदलाव का संकेत है। ऐसी स्थिति में भालू तनाव में आ जाते हैं और उनका व्यवहार आक्रामक हो जाता है।”

श्री पांडे ने आगे बताया कि भोजन की कमी और फसलों की घटती पैदावार ने भी समस्या को बढ़ाया है। “पहाड़ी इलाकों में किसानों की खेती लगातार घट रही है, जिससे भालुओं के लिए भोजन का प्राकृतिक स्रोत कम हो गया है। फलदार पेड़ और झाड़ियां, जो पहले इनके लिए प्रमुख आहार का स्रोत थीं, अब कम हो रही हैं। वहीं, भारी बारिश और भूस्खलन से कई इलाकों में भालुओं के प्राकृतिक आवास को भी नुकसान पहुंचा है।”

मानसून के दौरान हुई भारी बारिश के कारण कई वन्यजीवों के आवास स्थलों पर मलबा आया है, जिससे उन्हें अपने स्थान छोड़ने पड़े हैं और संघर्ष की संभावना बढ़ी हैl

वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में भालुओं के हमलों में उतार-चढ़ाव देखा गया है, लेकिन 2025 में अब तक हुई मौतें चिंताजनक हैं:

| वर्ष | भालू हमले में मौतें | घायल व्यक्ति |
| :— | :— | :— |
| 2020 | 10 | 99 |
| 2021 | 13 | 95 |
| 2022 | 1 | 57 |
| 2023 | 0 | 53 |
| 2024 | 3 | 65 |
| 2025 (अक्टूबर तक) | 4 | 41 |

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